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उत्तर प्रदेश भी तम्बाकू निषेध प्रदेश हो

Posted On: 11 Sep, 2012  
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आरक्षण का जनक जातिवाद

Posted On: 10 Sep, 2012  
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Hello world!

Posted On: 10 Sep, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय मुनीश जी सादर प्रणाम, सर्वप्रथम प्रतिक्रिया देने में विलंब के लिए खेद है| माननीय महोदय आरक्षण का कारन जातिवाद है|क्या जातिवाद को समाप्त करने के लिए हम सरकार की नीतियों का मुहँ ताकते रहें,क्या हमें अपनी तरफ से कोई भी सार्थक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है|आरक्षण के लिए एक विशेष समुदाय को दोषी ठहराना और आरक्षण का पुरजोर विरोध करना,समाचार पत्रों में,इन्टरनेट के ब्लॉग में विरोधाभावी विचार प्रस्तुत करना,यह सब प्रयत्न सभी लोग करते हैं पर जब आरक्षण के जनक जातिवाद की बात आती है तो हमें सरकार की नीतियों की क्यों आवश्यकता पड़ती है? माननीय महोदय आज भी भारत के अनेकों मंदिरों के बहार द्वार पर लिखा होता है दलितों का प्रवेश निषेध,आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में दलित समुदाय के बच्चों से जिनको शिक्षा की आवश्यकता हैं उनसे विद्यालयों में शिक्षा देने के बजाय पखाना साफ़ करवाया जाता है,दलित महिला द्वारा मध्यान भोजन पकाने पर उच्च जाती के बच्चों द्वारा भोजन का बहिष्कार किया जाता है,गरीब निर्धन दलितों से हाथों द्वारा मैला उठवाया जाता है,दलित युवक को आपनी ही शादी में घोड़ी पर बैठने का अधिकार नहीं है,उच्च जाती की बस्तियों से गुजरने पर चप्पल हाथ में उठवाया जाता है| इसलिए आरक्षण हमारे लिए एक मौका है अपने जीवन स्तर एवं सामाजिक स्तर को सुधारने का| माननीय महोदय, हम बिल्कुल एक स्वस्थ प्रतियोगिता के लिए तैयार हैं पर क्या आप लोग एक स्वस्थ एवं सभी को एक सामान अधिकार के वाले समाज के लिए तैयार हैं? जनरल वालो की पीड़ा है की रिजर्व कैटेगरी वाले कम नंबर ला के सीट पा जाते हैं....उनसे ज्यादा नंबर पाने वाले जनरल वाले सीट नहीं पाते .....पर मेरे भाई ये बताइए की जो जनरल वाले अपनी कैटगरी से प्रतिस्पर्धा में नाकाम हो जाते हैं.....उन को केवल एससी ,ओबीसी ,एसटी की सीट क्यों नजर आती है...जनरल वालो के दिमाग में ये बातें कौन भरता है उनके नेता या उनके बुद्धजीवी...?.....जनरल वालो की ये बुरी आदत जो हजारो सालों से है...जब वो अपने घर में हार जाते हैं तो दुसरे के घर में मुह मारने आ जाते हैं....यानी एस सी एसटी ओबीसी के घर में .......पर उन्हें नहीं पता जो खुद अपनों से हार जाते हैं उनका तो उनका भगवन भी नहीं हुआ ....तो मेरे भाई दुसरे की कमी मत निकालो पहले अपनी कमी को सुधारो....वर्ना सिर्फ निर्दोष को दोष देने वाले और अपना दोष छुपाने वालो का अस्तित्व एक दिन जरुर ख़त्म हो जाता है.....वैसे आपकी मर्जी !!!!! बिल्कुल सत्यवचन कहा आपने जो दीप स्वयं नहीं जलता प्रकाश नहीं देता वो दुसरे दीपों को क्या जलाएगा|

के द्वारा: rajanbheem1 rajanbheem1

आदरणीय राजनभीम जी प्रथम ब्लॉग की आपको बधाई आशा है आप ऐसी ही लिखते रहेंगे. निश्चित ही आरक्षण का कारण जातिवाद है लेकिन 1९४७ से और आज तक हमारी सरकारों ने ऐसी कोई निति नहीं बनाई जिस से ये प्रथा ख़त्म हो, बल्कि एस सी एक्ट, और आरक्षण के ज़रिये इसको बढाने का काम किया आपने डॉ साहब के ब्लॉग पर मेरे विचारों से असहमति दिखाई परन्तु ये नहीं बताया की जो शैक्षिक तरीका मैंने सुझाया है वो कहाँ गलत है ...... या तो आपने वो पढ़ा ही नहीं या फिर आप सामान धरातल पर, सामान परिस्थितियों में एक स्वस्थ प्रतियोगिता के लिए तैयार नहीं और आरक्षण के ज़रिये ही मुकाबला करना चाहते हैं, आपने जो उदहारण दिया की ५६ प्रतिशत वाले के आई आई टी में ८५ % अंक आये, लेकिन ये नहीं बताया की वो जिसके स्थान पर आरक्षण के कारण आई आई टी में पहुंचा वो उस से कितना आगे था और यदि वो उसके स्थान पर होता तो उसके कितने अंक होते ......... बात अंकों की भी नहीं है बात है काबिलियत की क्या आप चाहेंगे की आपके बच्चे उस व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करैं जो खुद ही पढ़ाई में सबसे पीछे था या उस से जो स्वयं आगे था और दूसरों को आगे रख सकता था........ याद रखिये जो दीप स्वयं नहीं जलता प्रकाश नहीं देता वो दुसरे दीपों को क्या जलाएगा

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra




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